Sunday, April 14, 2013

मुहब्बत और मुसीबत का महासंग्राम

 

ज़िन्दगी को कोई कहता इक सफ़र
कहानी दो दिनों की है ये कहता है कोई
पर मुझसे पूछो तो कहूँगी ज़िन्दगी
मुहब्बत और मुसीबत का महासंग्राम है

मेरे प्यार ने तो ये संसार से
हार मान लीनी आज हाए रे
राह मेरी आज तेरी राह से
दूर कहीं दूर दूर दूर जाए रे

ज़िन्दगी को सफ़र समझने वाले बहुत हैं, ज़िन्दगी की उम्र दो दिन की बताने वाले भी बहुत होंगे। और मुहब्बत और हालात की रस्साकशी का ज़िक्र करने वाले भी कुछ कम नही। लेकिन मेरी याद में मुहब्बत और ज़ालिम ज़माने की तक़रार को ‘महासंग्राम’ की संज्ञा देने वाले कम-अज़-कम हिंदी फ़िल्मी गीतों में तो नज़र नहींआते हैं।

फिल्म आशा (१९४८) के इस गीत में गीतकार मेघानी ने 'ज़ालिम ज़माने' को एक ‘मुसीबत’ बता कर, मुहब्बत के साथ महासंग्राम में उतार दिया है। गीत का भाव निराशावादी है जहाँ आख़िरकार मुहब्बत संसार के आगे घुटने टेक कर, एक अलग राह इख़्तियार कर 'अंतिम विदाई' की परिकल्पना करती है।

लीजिये सुनिए लता मंगेशकर द्वारा गया ये गीत जिसे स्वरबद्ध किया हैं खेमचंद प्रकाश ने।

दूर जाए रे - आशा (१९४८) - लता मंगेशकर - खेमचंद प्रकाश - मेघानी