Monday, June 19, 2006

जन्मदिन

वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

गुलज़ार साहब का यह एक शे’र मुझे बहुत पसन्द है। एक सीधी सी बात बहुत ही आसान लफ़्ज़ों में बयान की गयी है; लेकिन ये फ़लसफ़ा हक़ीक़त के कितना क़रीब है? आज जब मेरा जन्मदिन है, ये शे’र मेरे ज़ेहन में बारहा गूँज रहा है।

एक वक़्त था जब मैं इस दिन अपनी गुज़श्ता ज़िन्दगी के सफ़र पर निकल पड़ता था। ये एक ज़रिया था अपनी ज़िन्दगी की आशा और निराशा, नशेब-ओ-फ़राज़, उपलब्धियों और असफलताओं के आंकलन का। एक मुसाहिब की तरह जो नामा-ए-ज़िन्दगी में सूद-ओ-ज़ियाँ का हिसाब रखता है। लेकिन अब मैं इस वार्षिक कार्यकलाप में अपना समय व्यर्थ नहीं करता हूँ। भला क्यों?

मेरा ये मानना है कि जहां एक तरफ़ अपनी गुज़री हुई ज़िन्दगी का जायज़ा लेने में अपनी ग़लतियों से सीख लेने का लाभ अवश्य है, वहीं दूसरी ओर एक ख़तरा भी है – अपने माज़ी में जीने का। साल दर साल मैंने पाया कि इस क्रिया से मुझे लाभ कम और हानि अधिक हुई है। जब-जब मैं इस पुनरावलोकन की क्रिया में उतरता, मेरा मन बस अतीत की निराशा और दुख में जा अटकता। और फिर उससे अपना दामन खेंच पाना मेरे इख़्तियार से बाहर हो जाता। नतीजा ये कि अपने माज़ी से सीख ले कर अपने मुस्तक़बिल को संवारने कि बजाए मेरा वर्तमान भी अतीत की सियाह रोशनी से घिर जाता। सालगिरह एक ख़ुशी का अवसर होता है, इस दिन ग़मों के आग़ोश में रहना निहायत बेवक़ूफ़ी ही है। इस आत्मघाती चक्र से निकलना मेरे लिये अनिवार्य हो चला था। सो मैने आत्ममन्थन की राह तज दी।

अब आप पूछेंगे कि भला इस बात से गुलज़ार साहब के शे’र का क्या सम्बन्ध? सतही तौर पर तो कुछ भी नहीं। लेकिन ज़रा ग़ौर से देखें तो गुलज़ार साहब माज़ी के बजाय हाल-ओ-मुस्तक़बिल की फ़िक्र बयान कर रहें हैं। हाँ, अपने भविष्य की इस सोच को नकारात्मक अथवा सकारात्मक दोनों तरह से देखा जा सकता है। एक निराशावादी व्यक्ति इस शे’र को ग़मगीन क़रार दे सकता है। इस नज़रिये से पहले मिसरे को शे’र का मरकज़ मान कर अपनी आइन्दा उम्र के घटने का विलाप किया जा सकता है। लेकिन मेरा दृष्टिकोण थोड़ा पृथक है। मैं इसे एक आशावादी शे’र मानता हूँ। मेरी समझ से इस शे'र का सार दूसरे मिसरे में छिपा है। 'साल बढ़ाना' मेरी नज़र में समझदार होने का द्योतक है। अपनी समझ, अपने अनुभव से अपने भविष्य को रचनात्मक मोड़ देने का प्रयास है।

काश मैं अपने माज़ी के ग़मों में उलझने के बजाए अपने अनुभवों से सीख लेने की क्षमता रखता।